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Thursday, October 31, 2013

प्रधानमंत्री नेहरू हैदराबाद की मुक्ति के लिए सरदार की योजना को असफल बनाना चाहता था!

1947 बैच के आईएएस अधिकारी एम.के. नायर ने अपने संस्मरण ''विद नो फीलिंग टू एनी बाडी'' में लिखा है कि प्रधानमंत्री नेहरू हैदराबाद की मुक्ति के लिए सरदार की योजना को असफल बनाना चाहता था । पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा एक कैबिनेट बैठक के दौरान सरदार को अपमानित और लांछित किया गया। उसने कहा ''आप पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझाव और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता।'' नेहरू उस बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाया जिसमें निजाम की निजी सेना रजाकारों के चंगुल से सेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार किया जा रहा था। हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुए कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब श्री पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। अगर एम.के. नायर द्वारा लिखित बातें वास्तविकता हैं तो कांग्रेस बताए कि सच क्या है?
नेहरू की लालसा, ब्रिटिश सरकार की चाहत, गांधी का नेहरू के प्रति मोह ने उन्हें देश की बागडोर नेहरू को देने के लिए विवश किया। गांधी के प्रति सम्मान के कारण राष्ट्र को समर्पित सरदार पटेल को झुकना पड़ा। इतिहास पढऩे पर कभी-कभी लगता है कि गांधी ने भी पटेल से इंसाफ नहीं किया। 
1920 से 1947 तक कांग्रेस के कुल 20 अधिवेशन हुए। 1939 को छोड़कर गांधी की इच्छा से ही अध्यक्ष बनाए जाते थे। कांग्रेस संगठन पर सरदार पटेल का प्रभुत्व था परन्तु गांधी सरदार पटेल की राय को उतना महत्व नहीं देता था । 1929 में प्रांतीय समितियों के अध्यक्ष पद के लिए गांधी के पक्ष में पांच, पटेल के पक्ष में तीन और नेहरू के पक्ष में दो मत आए परन्तु गांधी ने कहा कि पटेल मेरे साथ रहेगा। इस तरह सरदार पटेल को नामांकन वापस लेना पड़ा। हालांकि 1931 में कराची अधिवेशन में सरदार को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। 
अगर सरदार देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो कश्मीर का मसला हल हो गया था। भारत विभाजन की घोषणा होते ही जब पाकिस्तान की सेना ने कबायलियों के साथ कश्मीर क्षेत्र में घुसपैठ करा कर हमला किया तो भारतीय सेना ने तत्कालीन जनरल राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में संघर्ष करके पाक सेना को खदेड़ दिया। भारतीय सेना आगे बढ़ रही थी लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला प्रेम के कारण युद्ध विराम का आदेश दे दिया। कश्मीर में धारा 370 नेहरू और शेख अब्दुल्ला के दिमाग की उपज थी। नेहरू कश्मीर मसला संयुक्त राष्ट्र परिषद में ले गया लेकिन आज तक क्या हुआ। काश! नेहरू ने कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति सरदार पटेल को दी होती तो पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग होता। सरदार पटेल ही नहीं मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने भी नेहरू से आक्रमण करके अधिकृत कश्मीर वाला अपना भूभाग वापस लेने को कहा, लेकिन नेहरू ने एक न मानी। मुझे नहीं लगता कि यह इतिहास आज के बच्चे पढ़ते होंगे, और कांग्रेस चाहती भी नहीं कि ऐसा इतिहास पढ़ा जाए। नरेन्द्र मोदी ने सरदार सरोवर में लौह पुरुष की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित की है तो कांग्रेस को दर्द क्यों है? शायद यही कि कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार से बड़ी किसी की प्रतिमा नहीं चाहते।

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